विद्याभारती e पाठशाला

भारत के गौरवशाली

प्रिय आचार्य जी

आज भारत के गौरवशाली अन्तरिक्ष विज्ञान का पाठ है
परसों एवम कल के पाठ में आपने भारत के गौरवशाली विज्ञान को बताने की बात कही थी।

भारत का ज्ञान विज्ञान निश्चित ही बहुत गौरवशाली रहा है। इसमें तनिक भी शंशय नही है किन्तु शिक्षा नीति की दुर्वलता के कारण हमें वह सब पड़ना एवम पढ़ाना पड़ता है जो हमारे भाव को पुष्ट नही करता। किन्तु हम अपने छात्रों को तो भारत के गौरव से परिचित करा सकते है। और यह कार्य विज्ञान के आचार्य भली भांति कर सकते है। इसलिए आज का पाठ ध्यान से पढ़े।

जल्द ही भारत के गौरवशाली विज्ञान की श्रृंखला आप के सामने E पाठशाला की टीम प्रस्तुत करेगी।
राष्ट्रकवि श्री मैथलीशरण गुप्त जी की “भारत भारती” कविता की इन पंक्तियों में भारत के गौरवशाली विज्ञान का वर्णन बड़े सुंदर शब्दों में 

वृतांत पहले व्योम का 
प्रकटित हमीं ने था किया।
वह क्रन्तिमण्डल था हमीं से 
अन्य देशो ने लिया।
थे आर्यभट,आचार्य भास्कर 
तुल्य ज्योतिर्विद यहाँ।
अब भी हमारे मानमंदिर 
वर्णीय नहीं कहाँ।

जिस अंक विद्या के विषय में 
वाद का मुंह बंद है
वह भी यहाँ के ज्ञान रवि की 
रश्मि एक अमंद है।
डर कर कठोर कलंक से वा 
सत्य के आतंक से।
कहते अरब वाले अभी तक 
‘हिंदसा’ ही अंक से।

उन सुल्व सूत्रों के जगत में 
जन्मदाता है हमी।
रेखा गणित के आदि ज्ञाता 
या विधाता है हमी।
हमको हमारी वेदिया 
पहले इसे दिखला चुकी।
निज रम्य रचना हेतु वे 
रेखागणित सिखला चुकी।

आकार देख प्रकार थे हम 
जान जाते आप ही।
वे शास्त्र सामुद्रिक सरीखे 
थे बनाते आप ही। 
विज्ञानं से भी फलित ज्योतिष 
हो रहा अब सिद्ध है।
यद्यपि अविज्ञो से हुआ वह 
निंद्य और निषिद्ध है।

पढ़ते सहस्रों शिष्य है पर 
फीस ली जाती नहीं।
वह उच्च शिक्षा तुच्छ धन पर 
बेचीं दी जाती नहीं।
दे वस्त्र भोजन भी स्वयं 
कुलपति पढ़ाते है उन्हें।
बस भक्ति से संतुष्ट हो 
दिन दिन बढ़ाते थे उन्हें।
 

राकेश शर्मा
विद्याभारती@ICT

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